Sunday, 20 February 2022

चाँद रात

 सांझ है ठहरी हुई ,सुबह है थोड़ी बाकी ..

ओट से झांके जब चाँद, बादल हुए गुलाबी ... 

नभ का ये नज़ारा देख ,चंपा रही खिलखिलाती ...

महक उठा सारा मंज़र ,चदनियाँ गीत गाती ...😊😊😊


Wednesday, 16 February 2022

गांव की मिट्टी

 मेरा गांव मुझे बोहोत भाता है , 

जब भी खेत देखती वो मुझे बुलाता है ...

वो पनघट की गगरी ,वो रहट का पानी ...

वो कुवें की रस्सी ओर गिर्री की ची ची ,

मुझे बरबस अपनी ओर ही खिंचे ...

वो भट्टी पे पकते गुड़ की खुशबू ,

वो पनचक्की की पुक पुक पु ...

तराजू में बैठ झूलने का अलग सा सुख ,

खेतो से तोड़ चना मटर मिटा लेते अपनी भूख...

चूल्हे की रोटी और  बरोसी का दूध   ,

मक्खन का बिलोना व  छाछ की मुछ...

बोहोत सी यादे ,जहन में है 

लिख न सकूँ ,सब एक सपने जैसे है...

सब कुछ छोड़ के शहर में कुछ पाने को आये ,

मिला बोहोत  , पर यहाँ की हवा न मन को भाये...

मेरे गाँव की मिट्टी मुझे बहुत याद आये !!!!!




Sunday, 13 February 2022

क्या यही है प्यार

क्या यही है प्यार ...

उसे समुंदर पसंद और मुझे पहाड़...
उसे उगता हुआ सूरज, मुझे ढलती हुई "सांझ"....
उसे बारिश से चिढ़ ,मुझे भीगने से प्यार ..
उसे धूल से नफरत, मेरा मिट्टी से जुड़ाव...
वो शांत गंभीर मैं उतनी ही वाचाल...
सब कुछ तो अलग है , फिर भी है साथ ...
क्या इसी को कहते है प्यार ....

बचपन का संदूक

 माँ के घर मे एक पुराना कमरा था ,

था अगड़म बगड़म सामान पर तगड़ा पहरा था ।

छूने न देती थी माँ किसी को कभी ,

बोलती सबको  मेरी जायदाद है ये सभी ।

माँ के गुजर जाने के बाद मैंने खोला,

सारे सामानों के बीच एक संदूक मिला ।

खोल के देख मैं तो खो गयी ,संदूक तो सपनो से भरा था 

कुछ कंचे ,पुरानी गुड़िया , रसोई के खिलौने और गिल्ली

डॉक्टर का सेट ,दिए का तराजू और बोलने वाली बिल्ली 

देख मेरी आंखे भर आयी , मां की पीड़ा जो उसने सबसे छिपाई है

जब बच्चे बड़े हो अपनी दुनियां में खो जाते है 

इस संदूक में वो बीता बचपन सहलाती है ,उसकी सारी खुशियां एक छोटे संदूक में सिमट जाती है ...😊



Thursday, 2 August 2018

Travelling n food

हेल्लो हेल्लो
दोस्तो आज मैं गुरुग्राम के एक छोटे से रेस्ट्रा के बारे में बताने जा रही हूं ...
बहुत इन्तज़ार के बाद बारिश ने दस्तक दी औऱ मौसम ख़ुशगवार हुआ तो निकल पड़े बेटी के साथ इधर उधर घुमक्कड़ गिरी करने के बाद लगा पेट कुछ  बोल रहा है कि मेरा भी ख्याल कीजिये मोहतरमा 😊
फिर सोचा किधर जाए नॉनवेज या वेज़ खाये तभी मन मे एक सुझाव दिया आज कहीं टपरी में शांति से वेज़ ही खाएंगे शोर गुल से दूर मौसम का आनंद लेते हुए ...
बस ऊपर वाले ने सुन ली मेन रोड पर ही एक छोटा सा क्यूट सा रेस्ट्रा दिख गया पार्किंग की भी कोई दिक्कत नही सो उतर गए और सीढ़ियों से ऊपर वाले पोर्शन में बैठ गए ...औऱ आर्डर कर दिया थोड़ा कॉन्फिडेंस तो था रेस्ट्रा के नाम से (पिंड जंक्शन)कि पंजाबी है तो खाना बुरा नही होगा ..
लेकिन जब खाया तो इतना अमेजिंग होगा सोचा नही ..मिक्स वेज में सारी सब्जियों का स्वाद बरकरार था परफेक्ट पकी हुई कम मसले में और नान एकदम सॉफ्ट सभी चीजे लाजवाब थी खा कर जो संतुष्टि हुई मन  और पेट  दोनों की बयान नही कर सकते ...
अब बताती हूँ वो बात जिससे मैं सबसे ज्यादा प्रभावित हुई ये रेस्ट्रा एक महिला चला रही थी वो भी ओपन में बैठ कर हिसाब देखना वो भी  हरियाणा जिले में काबिले तारीफ है ...
तो दोस्तो कभी छोटे रेस्ट्रा में क़्वालिटी खाना खाने का मन हो तो पिंड जंक्शन जरूर जाए