माँ के घर मे एक पुराना कमरा था ,
था अगड़म बगड़म सामान पर तगड़ा पहरा था ।
छूने न देती थी माँ किसी को कभी ,
बोलती सबको मेरी जायदाद है ये सभी ।
माँ के गुजर जाने के बाद मैंने खोला,
सारे सामानों के बीच एक संदूक मिला ।
खोल के देख मैं तो खो गयी ,संदूक तो सपनो से भरा था
कुछ कंचे ,पुरानी गुड़िया , रसोई के खिलौने और गिल्ली
डॉक्टर का सेट ,दिए का तराजू और बोलने वाली बिल्ली
देख मेरी आंखे भर आयी , मां की पीड़ा जो उसने सबसे छिपाई है
जब बच्चे बड़े हो अपनी दुनियां में खो जाते है
इस संदूक में वो बीता बचपन सहलाती है ,उसकी सारी खुशियां एक छोटे संदूक में सिमट जाती है ...😊
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