Wednesday, 16 February 2022

गांव की मिट्टी

 मेरा गांव मुझे बोहोत भाता है , 

जब भी खेत देखती वो मुझे बुलाता है ...

वो पनघट की गगरी ,वो रहट का पानी ...

वो कुवें की रस्सी ओर गिर्री की ची ची ,

मुझे बरबस अपनी ओर ही खिंचे ...

वो भट्टी पे पकते गुड़ की खुशबू ,

वो पनचक्की की पुक पुक पु ...

तराजू में बैठ झूलने का अलग सा सुख ,

खेतो से तोड़ चना मटर मिटा लेते अपनी भूख...

चूल्हे की रोटी और  बरोसी का दूध   ,

मक्खन का बिलोना व  छाछ की मुछ...

बोहोत सी यादे ,जहन में है 

लिख न सकूँ ,सब एक सपने जैसे है...

सब कुछ छोड़ के शहर में कुछ पाने को आये ,

मिला बोहोत  , पर यहाँ की हवा न मन को भाये...

मेरे गाँव की मिट्टी मुझे बहुत याद आये !!!!!




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