मेरा गांव मुझे बोहोत भाता है ,
जब भी खेत देखती वो मुझे बुलाता है ...
वो पनघट की गगरी ,वो रहट का पानी ...
वो कुवें की रस्सी ओर गिर्री की ची ची ,
मुझे बरबस अपनी ओर ही खिंचे ...
वो भट्टी पे पकते गुड़ की खुशबू ,
वो पनचक्की की पुक पुक पु ...
तराजू में बैठ झूलने का अलग सा सुख ,
खेतो से तोड़ चना मटर मिटा लेते अपनी भूख...
चूल्हे की रोटी और बरोसी का दूध ,
मक्खन का बिलोना व छाछ की मुछ...
बोहोत सी यादे ,जहन में है
लिख न सकूँ ,सब एक सपने जैसे है...
सब कुछ छोड़ के शहर में कुछ पाने को आये ,
मिला बोहोत , पर यहाँ की हवा न मन को भाये...
मेरे गाँव की मिट्टी मुझे बहुत याद आये !!!!!
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